” ‘तरकारी होखे चाहे दाल’ अगर जरूरत से जियादा निमक पड़ जाला त पूरा सवाद बिगड़ जाला खाना के! ठीक ओहि तरे पईसा! अगर पइसा भी आदमी के जीवन में जरूरत से जियादा आ जाला त जिनगी के सवाद बिगाड़ देला”
आज हमनी के ईक्सवीं सदी में जी रहल बानी जा l जिनगी के गाड़ी बहुते तेज रफ्तार से दौउड रहल बिया l केहु घर के रोजी रोटी खातिर आपन माटी आपन गाँव से पलायन कर रहल बा ,त केहु ढेर पइसा कमाए के खातिर आपन दिमाग लगा रहल बा l एक दूसरा के पछाडे खातिर धनवान बने खातिर तरह- तरह के जुगति लगा रहल बा लोग l सच्चाई त ई बा कि लोग तरक्की त कइले बा मगर बहुत कुछ गंवा भी रहल बा.. सरकार भी ढेर योजना चलवले बा कि लोगन के जीवन स्तर में सुधार आवे l आज अफ़सोस! के साथ कहे के पड़त बा कि जिनगी में पइसे सब कुछ ना होला l केहु के हक़ मार के पइसा कमाइल कहाँ तक सही बा? ईमान बेच देले बा लोग.. कोर्ट, कचहरी, थाना में सबसे जियादा केस जमीन जायदाद , चोरी, घोटाला के देखे के मिल रहल बा l
संयुक्त परिवार के विभाजन हो रहल बा, घर के बुढ़ माई बाबू के लोग वृद्धा आश्रम में बइठा देले बा l ई सब कुछ के जड़ पईसे हीं बा ऐकरा के कोई झूठला ना सके l समाज पहिले से शिक्षित जरूर भयिल बा मगर नैतिक पतन दिन पर दिन हो रहल बा.. प्रकृति से हमनी के सीखे के चाही l कवनो भी पेड़ आपन फल खुद ना खाये बाँट देला इंसान खातिर, पशु पक्षी खातिर l नदी भी आपन पानी सबके पियावेले, जरूरतमंद के प्यास बुझावेलेl तबो ई मानव कुछ सीख ना लेलस!
सबसे कड़वा सच त ई बा कि गाय आपन अमृत नीयन दूध मे मिलावट ना करे, मगर ई लालची इंसान पइसा खातिर मिलावट कर देला ओहमे पानी डाल के! ई वैज्ञानिक लोग भी प्राकृतिक तत्व के आपस में मिला के रासायनिक अभिक्रिया द्वारा बम, गोला, बारूद भी बना देत बाड़े l विकास के ई पराकाष्ठा विध्वंसकारी रूप ले चुकल बा l परमाणु से हमला भी होता एक दूसरा के राख में मिलावे के ख़ातिर!
आप अपने करेजा प हाथ रख के कहीं, जेतना प्रकृति से हमनी के मिलल बा ओकरा बदले में हम आप प्रकृति के का देले बानी जा? पेड़ पौधा अनघा रोज़ कटात बा इहवांl काहे से कि स्मार्ट सिटी बसावे के बा l बड़े बड़े मॉल, अपार्टमेंट, हाईवे बनी l आज शहर के ढेर मकान में एसी लागल बाl
रउआ के पता बा न कि एसी से क्लोरो फ्लोरो कार्बन निकलेला, जवन कि बहुत हीं हानिकारक होला l आज शहर में तमाम सुविधा बा फिर भी शहर कराह रहल बा l एकर परिणाम इहे ह l रउआ आजो गाँव देहात में जाईं, जवन शुद्ध हवा पानी ओहिजा मिल जाई उ कतहि ना मिलीl
पइसा कमाए वाला हर सुख साधन रखले बा घर में, मगर ओह घर में सुगर, ब्लड प्रेशर, अनिद्रा, तनाव जियादा देखे के मिलत बा l एकर सबसे बड़ा कारण इहे बा कि शहर में प्रकृति के खूब दोहन भयिल बा l
दूसरी बात कि शहर के लोग के जीवन स्तर ढेर भाग दौड़ वाली बा, ऑफिस, कंपनी, कारखाना में लाखों लोग नियमित काम करत बाl आदमी अउर मशीन में कुछ खास अंतर नईखेl
आदमी मशीन बन गईल बा ई आधुनिक जुग मेंl
अब त विकास के स्तर एतना बढ़ गईल बा कि हर आदमी के पास मोबाइल हो गईल बा l इन्टरनेट से लोग जुड़ गईल बा l कवनो भी बात आ संदेश मिनट भर में वायरल हो जाता l
आज हजारों लाखों कंपनी लुभावना समान बाजार में उतार के रउआ आ हमरा पाकिट से पइसा खींच रहल बिया l भौतिक वाद के जुग में सब केहु एक दूसरा के नकल करता l
कुल्ह मिला के देखल जाव त ‘पइसा’ के भूख सबका पास बा l ई देश में कबो महान संत कबीर के दिहल संदेश रहे कि ” साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब सामाये l मै भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाये “
आज कबीर, तुलसी, रहीम, के अमृत वाणी आ संदेश के लोग भूला गईल बाl लूट पाट, चोरी, हक़मारी चरम प बा आज l तानिका तानिका पइसा, जमीन जायदाद खातिर हत्या हो जाताl
लोग ई आधुनिक जुग में जिये के कला भूला गईल बा.. परिणाम सबके सामने बा!
धनवान आ दू पइसा पाके लोग खुद के भगवान समझ लेता l एक बात गाँठ बान्ह लिहि आप ,प्रकृति रउआ से दिहल धन छीन के गरीब गुरबन में बांटे भी जानेले l
ई कोरोना काल एक बात जरूर सीखा देलस कि पइसा, पद, पावर हीं सब कुछ ना होलाl बढ़िया बढ़िया धन सेठ लोग भी काल के गाल में समा गइलें!
हम त इहे कहब कि माई बाप के दुआ आशीर्वाद लिहि आपलोग l केहु के हक़, हिस्सा मत मारीं! जीवन में संतुलन बना के राखी आपलोगl जवन चीज भीरी बा ओहि में खुश रहीं लोभ लालच मत पाली!
अगर जरूरत से जियादा धन दौलत आपके लगे बा त ओहके गरीब, बेबस, लाचार लोगन में बाँटी l ई पइसा सच में जीवन के स्वाद बिगाड़ देला l
अंत में एगो हथजोरी बा रउआ सभे से कि खाना -पीना देशी खाई l तरह तरह के बाजारू ब्यंजन आपके बीमार क दिहि l पानी त डिब्बा में पैक होके बेचात हीं रहे, अब आक्सीजन रूपी संजीवनी हवा खातिर भी हाहाकार मचल बा… डॉक्टर लोग भी मानवता भूल के खून चूस रहल बाड़े l ईश्वर सबके हिसाब करे जानेलनl आज आदमी आदमी से सामाजिक दूरी बना देले बा ई कोरोना महामारी में l केहु केहु में छुआत नईखे चाहत l आज जेतना उपाय लोग बता रहल बा कि साफ सफ़ाई राखि, गोड़ हाथ धोईl काढा पीहीं.. उ बहुत पहिले ऋषि मुनि लोग बता देले रहे l मगर कुछ तथाकथित ज्ञानी लोग ओह पर अमल ना कईलस!
अभियो सुधरे के समय बा फिर से आपन संस्कृति आ सभ्यता के आप अपनाईl पेड़ पौधा भी जादा से जादा लगाईं, हँस के जिनगी बिताईं l आपन माटी आपन गाँव से जुडल रहीं जिनगी के स्वाद बनल रही l

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