भभुआ/कैमूर(बंटी जायसवाल).  गुरुवार को कैमूर जिले के भभुआ शहर सहित ग्रामीण इलाके में अपने पुत्र की दीर्घायु के लिए माताओ ने जीवित्पुत्रिका निर्जला व्रत रखा. माताएं गुरुवार के सुबह से लेकर शुक्रवार के सुबह तक उपवास रखेंगी. शहर के सुअरन नदी, अखलासपुर का बाबा जी का पोखरा, पूरब पोखरा आदि कई जलाशयों व नदी में माताओ ने स्नानादि करने के बाद पूजा अर्चना किया गया. पुत्र ही भले ही कुपुत्र हो, पर माता कुमाता नहीं हो सकती, यह कहावत की चरितार्थ रूप भारतीय संस्कृति में गुरुवार को देखने को मिला. जब अपने संतान व परिवार की कल्याण की कामना के लिए माताओं ने 24 घंटे के निर्जल व्रत कर पूजा अर्चना किया.

पूरे जिले में जीवित्पुत्रिका अर्थात जिउतिया व्रत को लेकर उत्साह व श्रद्धा का वातावरण रहा. घर-घर में सुबह से ही चल रही तैयारियों का दृश्य शाम होते ही नदियों और सरोवरों के तट पर दिखा. जहां माताओं ने विधिवत अस्ताचलगामी भगवान भास्कर के साथ ही जगत्जननी मां जगदंबा के उस सिया स्वरूप का पूजन किया, जिन्होंने पुत्र, पति वचन और परिवार कल्याण की कामना से भू-समाधि ले उत्कट उत्सर्ग का अनुपम, अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया था. इस दौरान शहर के सूअरन नदी, डाकेश्वर महादेव मंदिर, पूरब पोखरा, कंचन नगर घाट, सहित कई जगहों पर व्रती माताओं ने राजा जीमूतवाहन की कथा सुनी और चील्हो-सियारो तक के लिए उनका हिस्सा निकाला.

आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को संतान कल्याण की कामना लेकर रखे जाने वाले जीवित्पुत्रिका व्रत के दिन गुरुवार की भाेर में ही माताओं ने उठकर सूर्योदय के पूर्व जलग्रहण किया और फिर पुत्र के दीर्घायु होने की कामना को लेकर पूरे दिन और रात में निर्जल व्रत रखा. व्रत से संबंधित कथाएं सुनीं और ईश्वर से पुत्र की लंबी उम्र व सही राह देने की कामना की.  शहर के सुअरन नदी घाट पर व्रती महिलाओं का सैलाब उमड़ा रहा. मेले जैसे दृश्य के बीच कथा और हवन-पूजन के कार्यक्रम चलते रहे. पुत्रवती महिलाओं के अतिरिक्त उन महिलाओं ने भी पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर व्रत रखा, जिनके पुत्र नहीं है.

इधर इस त्योहार पर खरीददारी के लिए भी बाजार में लोगों को काफी भीड़ देखी रही. व्रतियों द्वारा पूजन के दौरान प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाने वाले फलों के अतिरिक्त चीनी से बने विशेष प्रकार के छोटे लड्डू यानि लेड़ुई की खूब बिक्री हुई. व्रतियों ने गले में लाल-पीले रंग के कच्चे धागों में गुंथी प्रत्येक पुत्र के नाम से बनी सोने व चांदी की प्रतीक चिह्न जिउतिया को धारण किया. सायंकाल बरियार की दातून कर स्नानादि से निवृत्त होकर माताएं नूतन वस्त्र धारण कर तालाबों, सरोवरों और नदियों के तट पर कथाएं सुनीं. व्रत का पारण शुकवार को सूर्योदय के बाद दोपहर 12 बजे के पहले तक कर लेंगी.

दुर्गावती डैम में स्नान के लिए व्रतियों की उमड़ी भीड़ इधर, रामपुर प्रखंड के दुर्गावती जलाशय डैम पर जिउतिया की स्नान करने के लिए कैमूर व रोहतास जिले के क्षेत्र के कई गांवों की हजारों माताएं स्नान करने के लिए पहुँची. जहां माताएं, बहने व लोग ट्रैक्टर,पिकअप,मैजिक,टेंपो आदि से पहुँची. दुर्गावती जलाशय के दोनों किनारे पूरब तरफ रोहतास जिले महिला व्रती तो पश्चिम तरफ निकले नहर कैनाल व जलाशय के पानी में स्नान के लिए कैमूर के रामपुर व भगवानपुर प्रखंड क्षेत्र के कई गांवों की व्रती पहुँची हुई थी.

जहां जिउतिया का स्नान करने के लिए करमचट डैम(दुर्गावती जलाशय) पर काफी भीड़ देखने को मिली. इस दौरान सुरक्षा के लिए रोहतास जिले की सीमा की तरफ रोहतास जिले के चेनारी थाना की पुलिस बल तो वही पश्चिम तरफ करमचट थाना की पुलिस बल भी तैनात रही. करमचट थानाध्यक्ष सच्चिदानंद मिश्र ने बताया कि दुर्गावती जलाशय पर जिउतिया के स्नान को लेकर पुलिस सुरक्षा के लिए तैनात रही.हर गतिविधियों पर नजर रखा जा रहा है। 

जिउतिया को लेकर यह है कथा- जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा महाभारत से जुड़ी हुई बतायी जाती है। पुराणों के अनुसार, अश्वत्थामा ने बदले की भावना से उत्तरा के गर्भ में पल रहे पुत्र को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। उत्तरा के पुत्र का जन्म लेना जरुरी था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों के फल से उस बच्चे को गर्भ में ही दोबारा जीवन दिया। गर्भ में मृत्यु को प्राप्त कर पुन: जीवन मिलने के कारण उसका नाम जीवित पुत्रिका रखा गया। वह बालक बाद में राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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